Monday, December 15, 2014

शहर

                    

   शहर



शहर की छाती पर आदमी चढ़ा है
या आदमी की छाती पर शहर खड़ा है
समझ नहीं आता
दोनों एक दूसरे को
कूढ़न ,चिंताएं बांटते हैं
बस जड़े काटते हैं
आदमी शहर में है
और शहर आदमी में
पर दोनों तन्हा हैं
दरअसल दोनों के अन्दर बवंडर है
दोनों ही खँडहर हैं
शहर में आबादी है
पर आबाद नहीं
भीड़ है
पर संवाद नहीं
दोनों सीढ़ी हैं
एक दूसरे के विकास की
पर विकसित हो कर भी
दोनों खुश नहीं
कैसा समीकरण है
बड़े-बड़े शहर में
आदमी गाँव ढूँढता है
और शहर
एक मामूली आदमी  

No comments:

Post a Comment