मेरी सारी मुस्कानों पर
क्यूं लगा है?
तुम्हारी सहमति का एक अजीब पहरा।
क्यूं जुड़ा है?
तुम्हारे खुश होने पर ही बस
मेरे खुश होने का रिश्ता..।
मेरे पंखों पर क्यूं
उतर आता है तुम्हारा वज़न।
आईना बन जाते हो क्यों?
मुझे सुंदर तो कभी, उदास दिखने को।
मील का पत्थर हूं मैं
पर तुम चाहो जब मुझे
पत्थर तो कभी, झरना बना देते हो।
पृथ्वी हूं, घूमती हूं धुरी पर अपनी।
पर तुम सूर्य बन कर।
कभी रात तो कभी, दिन दिखा देते हो।
क्या है ये ?
स्त्री हूं
आज़ाद हूं या पराधीन
ये प्रेम है या दमन
पूछना चाहती हूं।
ऋतु गोयल
प्रश्न पूछना जितना मुश्किल है उत्तर पाना उससे भी ज्यादा कठिन है।
ReplyDeleteमन छूती रचना।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३१ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
मील के पत्थर को सुविधाजनक ढंग से झरना बनाना निहित स्वार्थवश होता है
ReplyDeleteप्रतिरोध की रचना
सुंदर
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