Tuesday, February 17, 2026

मेरी आँखें

सुनो
बहुत अधिक सच कहती हैं
मेरी आँखें।
पढ़ लोगे तो
शर्मसार हो जाओगे।
या फिर प्रेम,स्नेह,अपनत्व,ममत्व
जो भी बचा है ना धरती पर
मनुष्य होने के लिए
खामख्वाह उनमें फंस जाओगे।

पीड़ा से भी तड़प सकते हो तुम
अगर तुमने मेरी पुतलियों की
हकीकत जान ली।

मैंने आँखें थोड़ी
तरेर ली अगर।
सचमुच जल जाओगे।
दोनों हाथ जोड़ कर
अंतिम साँस तक गिड़गिड़ाओगे।

मेरी खामोश आँखें
तुम्हें खुद-ब-खुद
मजबूर कर देंगी
तुम्हें अपने हर गुनाह की सजा
खुद भुगतने के लिए।

इनमें मेरे आंसू कहाँ देख पाओगे तुम
क्योंकि
उसके लिए नज़र नहीं
नजरिए की जरूरत है।
और तुम्हारे पास
न इबादत है,न मोहब्बत है।

मेरी दो आँखें
सिर्फ देखने और
काजल से संवरने भर के लिए नहीं हैं।
मेरे भीतर जो रड़क,रिसाव,रौद्र
और राग हैं।
उनका आईना है ये।

थोड़ा दूर रहती हूँ मैं
भीड़ में भी नाचीज़ दुनिया से
क्योंकि
जुबां सच नहीं कह सकती
और
आँखें बेजुबां भी बहुत कुछ
कह जाती हैं
इसलिए
एक चश्मानुमा पहन लेती हूँ मैं
इन आँखों पर
खुद को और औरों को
मोहब्बत और नफरत से
बचा लेने को.....
                  ऋतु गोयल



Sunday, February 1, 2026

गीत जाग हिंदू जाग

जाग-जाग-जाग रे, अब तो जाग -जाग रे। 
वक्त की पुकार है,निज हितों को त्याग रे।

कब तलक तू आंखें मूंद, स्वप्न देखता रहेगा।
स्वर्ग सी धरा को कोई, शत्रु लूटता रहेगा।
थाम के मशाल भगा,ये तमस के नाग रे।
जाग-जाग-जाग रे....

ये चोट मामूली नहीं,जमीर पे आघात है।
बात ये खुद की नहीं,मां भारती पे बात है।
भारती के शत्रुओं को,गोलियों से दाग़ रे।
जाग-जाग-जाग रे......

सैनिकों की भांति मन में, तू भी तो जुनून रख।
सरहदों पे वे डटे, तू देश में सुकून रख।
छेड़ साज़-साज़ पर, देश का ही राग रे। 
जाग-जाग-जाग रे.....

वसन है अपना केसरी,भगवा हमारी आन है।
ध्वज हमारा केसरी,ये ही हमारी शान है।
न झुका है, न झुकेगा,दिल में रख ये आग रे।
जाग-जाग-जाग रे......

लूट गया जो ये चमन,सिसकेंगी तितलियां सभी।
खू से जो सनी नदी,तड़पेंगी मछलियां सभी।
जाग-जा अब तो बचा,बहनों का सुहाग रे।
जाग-जाग-जाग रे.......
                     ऋतु गोयल

Friday, January 23, 2026

सरस्वती वंदना

हंस वाहिनी,ज्ञान दायिनी,तम हारिणी 
तुमको प्रणाम।
मां सुहासिनी, वीणा वादिनी,वर दायिनी तुमको प्रणाम।

चौसठ कलाओं से सुशोभित कर रही हो ये धरा। 
सप्त सुरों में गूंजती हो जिन स्वरों को तुमने वरा। 
स्वर दायिनी, वीणा वादिनी, वर दायिनी तुमको प्रणाम।

ज्योर्तिमयी तुम ज्ञान से कलुषित मन को पखारती।
एक छंद हो सरस्वती शब्द बाण से तम काटती।
शब्द दायिनी, वीणा वादिनी, वर दायिनी तुमको प्रणाम।

विद्वान के माथे पे तुम तकदीर बन कर शोभती।
जड़मती होते सुजान तुम बंधनों को तोड़ती।
विद्या दायिनी, वीणा वादिनि, वर दायिनी तुमको प्रणाम।

                 ऋतु गोयल

Sunday, October 15, 2023

मेरे राम

सिया जी के संग राम,ले रहे हैं सब नाम
नाम बिन झूठी सब कलियुगी माया है
नाम एक सत नाम पूरन करे जो काम
तर गया जिसने भी राम धन पाया है
मुख में हो गर नाम दिल में भी रहे राम
भक्त हनुमान ने ज्यों राम को बसाया है
और चाहे जितनी भी भव्य रामलीला करो
तुलसी से सीखो कैसे राम जी को ध्याया है


राम जी विचार है आचार ,व्यवहार है जी
पूजा व आराधना से राम नहीं मिलते
मंदिर बनाएं चाहे संपदा लुटाएं हम
भाव बिन राम जी ना कभी भी पिघलते
दीनों के दयालु राम कितने कृपालु राम
नाम भर लिखने से पत्थर हैं तरते
शबरी के झूठे बेरों में भी मीठा भाव चखा
यूं ही कोई राम भगवान नहीं बनते





Wednesday, July 20, 2022

कोई है जो बोलता है



             मौन

ढेरों प्रश्न-उत्तर
अनुत्तरित कतार में खड़े थे
अनगिन शब्द व वाक्य
अधरों के द्वार पर अड़े थे
मन में भावों का झंझावात था
तन की हरकतों में चक्रवात था
सौरमण्डल में अक्षरों के ग्रह-उपग्रह
तूफ़ानीय गति से घूम रहे थे
हर पल खामोशियों के जंगल उग रहे थे
भाषाओं के संसार में 
यकायक गूंगे हो गए थे सब के सब
विलक्षण थी वो दुनिया
जहाँ गीत-संगीत,अभिव्यक्ति खामोश थे 
पर हाँ
कोई था जो बोल रहा था
भीतर-बाहर,जन्म-जन्मांतर की
परतें खोल रहा था
वो गुनगुना रहा था
भीतर ही भीतर कुछ गा रहा था
तटस्थ था,खुशहाल था
अजीब था,बेमिसाल था
जिसे हम अब से पहले नहीं जानते थे
साधना के पहले कहाँ पहचानते थे
पर अब जाना
वो कौन था
दरअसल
वो मौन था
वो मौन था
वो मौन था
         ऋतु गोयल

Monday, June 27, 2022

मौन

ढेरों प्रश्न-उत्तर
अनुत्तरित कतार में खड़े थे
अनगिन शब्द व वाक्य
अधरों के द्वार पर अड़े थे
मन में भावों का झंझावात था
तन की हरकतों में चक्रवात था
सौरमण्डल में अक्षरों के ग्रह-उपग्रह
तूफ़ानीय गति से घूम रहे थे
हर पल खामोशियों के जंगल उग रहे थे
भाषाओं के संसार में 
यकायक गूंगे हो गए थे सब के सब
विलक्षण थी वो दुनिया
जहाँ गीत-संगीत,अभिव्यक्ति खामोश थे 
पर हाँ
कोई था जो बोल रहा था
भीतर-बाहर,जन्म-जन्मांतर की
परतें खोल रहा था
वो गुनगुना रहा था
भीतर ही भीतर कुछ गा रहा था
तटस्थ था,खुशहाल था
अजीब था,बेमिसाल था
जिसे हम अब से पहले नहीं जानते थे
साधना के पहले कहाँ पहचानते थे
पर अब जाना
वो कौन था
दरअसल
वो मौन था
वो मौन था
वो मौन था
         ऋतु गोयल



Wednesday, January 5, 2022

कविता(मन छूट रहा है)

धुंधला जाती है चलते-चलते जब भी मंज़िल।
तब अपने नैनों को जुगनू बना लेती हूं।
घना अंधेरा छा जाता है जब भी बाहर।
तब भीतर-भीतर एक दीया जला लेती हूं।

सौ-सौ दियें जलाऊं बेशक बाहर फिर भी।
ज्ञान बिना अज्ञान अंधेरा बो जाता है।
इस खातिर अंतर को मैं पहले रौशन करती।
फिर सारा तम ही खुद ब खुद ही खो जाता है।

खुद का अता-पता न हमको फिर भी पागल।
मन ये ढूंढ रहा न जाने किसको जाने।
अपनी ही साँसों के सरगम को न गाया।
कोलाहल को गा-गा कर हम हुए दीवाने।

एकांत साध ले ऐसा मन पे वश न पाया।
खुद का साथ ही हमको हरदम ही उकताया।
भीड़-भाड़ में बेशक हो हम निपट अकेले।
फिर भी हमने मेले में ही मन बहलाया।

भूल रहे हम,सब के सब हैं यहां मुसाफिर।
और दुनिया है केवल एक मुसाफिर खाना।
जो आने के संग जाने की करे तैयारी।
वही सुखी है जिसने इस सच को पहचान।

मृगतृष्णा के पीछे भागूं भागूं कितना।
भाग-भाग कर मन ही पीछे छूट रहा है।
प्यास बुझेगी इस मरुभूमि में क्या मेरी।
मन-मृग ढूंढ-ढूंढ कस्तूरी टूट रहा है।