झूठ को छलने न दो,जो सत्य है बतलाओ तुम।
चौंधिया रही हैं दृष्टियां,रोशनी से महल की।
है तमस बस झोपड़ी में, वहां दीप तो जलाओ तुम।
उल्लास हो, अट्ठाहस हो,रंगोलियां सजाओ तुम।
है रीत हर त्यौहार की, बस प्रीत से निभाओ तुम।
शगन है इस पर्व का,कुम्हार के घर हो उजाला।
दीप माटी के जला कर,दीपोत्सव मनाओ तुम।
ऋतु गोयल