तो खिलखिला के खिल उठेंगे, सबके सब सुमन।
न ये मेरा-तेरा है,हम सभी का देश है।
ये गगन ये धारा, सबका ही परिवेश है।
फिर एक-दूसरे पे क्यूँ, उंगलियाँ उठा रहे।
खुद तो सो रहे मगर, औरों को जग रहे।
ये भूत सा धुआं-धुआं, बादलों पे छा रहा।
गली-गली,हर डगर, गंद नजर आ रहा।
नदी-नदी,हर नहर, हम ही ज़हर घोलते।
धर्म के एक नाम पे, छल की दुकानें खोलते।
हैं कितने ही उद्यान पर, घुट रहा है दम यहां।
फूल-पत्तियों की आँखें, हो रही हैं नम यहां।
ऐ काश कि हम हवा को खुशबुओं का इत्र दें।
पर्यावरण को खुशी दें,साथ दें और मित्र दें।
क्या मदद को कोई अब और ग्रह से आयेगा।
देश है अपना तो क्या,तकदीर वो बनाएगा।
हम से ही संवरेगा ये,हमसे चहकेगा चमन।
खिलखिला के खिल उठेंगे सबके सब सुमन।
गर स्वच्छ हो तन-मन हमारा स्वच्छ हो वतन...
ऋतु गोयल