Friday, October 2, 2026

गीत स्वच्छता

गर स्वच्छ हो तन-मन हमारा,स्वच्छ हो वतन।
तो खिलखिला के खिल उठेंगे, सबके सब सुमन।
न ये मेरा-तेरा है,हम सभी का देश है।
ये गगन ये धारा, सबका ही परिवेश है।
फिर एक-दूसरे पे क्यूँ, उंगलियाँ उठा रहे।
खुद तो सो रहे मगर, औरों को जग रहे।
ये भूत सा धुआं-धुआं, बादलों पे छा रहा।
गली-गली,हर डगर, गंद नजर आ रहा।
नदी-नदी,हर नहर, हम ही ज़हर घोलते।
धर्म के एक नाम पे, छल की दुकानें खोलते।
हैं कितने ही उद्यान पर, घुट रहा है दम यहां।
फूल-पत्तियों की आँखें, हो रही हैं नम यहां।
ऐ काश कि हम हवा को खुशबुओं का इत्र दें।
पर्यावरण को खुशी दें,साथ दें और मित्र दें।
क्या मदद को कोई अब और ग्रह से आयेगा।
देश है अपना तो क्या,तकदीर वो बनाएगा।
हम से ही संवरेगा ये,हमसे चहकेगा चमन।
खिलखिला के खिल उठेंगे सबके सब सुमन।
गर स्वच्छ हो तन-मन हमारा स्वच्छ हो वतन...
             ऋतु गोयल

Tuesday, July 28, 2026

स्त्री

तुमसे पूछूँ ?
मेरी सारी मुस्कानों पर
क्यूं लगा है?
तुम्हारी सहमति का एक अजीब पहरा।
क्यूं जुड़ा है?
तुम्हारे खुश होने पर ही बस
मेरे खुश होने का रिश्ता..।
 मेरे पंखों पर क्यूं 
उतर आता है तुम्हारा वज़न।
आईना बन जाते हो क्यों?
मुझे सुंदर तो कभी, उदास दिखने को।
मील का पत्थर हूं मैं
पर तुम चाहो जब मुझे
पत्थर तो कभी, झरना बना देते हो।
पृथ्वी हूं, घूमती हूं धुरी पर अपनी।
पर तुम सूर्य बन कर।
कभी रात तो कभी, दिन दिखा देते हो।
क्या है ये ?
स्त्री हूं
आज़ाद हूं या पराधीन
ये प्रेम है या दमन
पूछना चाहती हूं।

      ऋतु गोयल


Saturday, February 28, 2026

मुक्तक होली

तू महावर मेरा, मैं हूं रोली तेरी।
तू मेरा हास्य है, मैं ठिठोली तेरी।
तू है आंगन मेरा,मैं रंगोली तेरी।
तू मेरा फाग है और मैं होली तेरी।

तू ख़याल है तो, मैं भी खयाल हूं।
तू धमाल है जो, मैं वो धमाल हूं।
तू भी खुशहाल है,मैं भी खुशहाल हूं। तू कमाल है गर, मैं भी कमाल हू।

मेरी मंजिल है तू,तू ही रस्ता मेरा
आंख में जो सजा, वो है सपना मेरा
रास खेले बिरज की, धरा पर चले
राधिका मैं तेरी, तू है कान्हा मेरा
                        ऋतु गोयल

मुक्तक जिंदगी

 फूल है तो कभी, शूल है जिंदगी।
 है सही तो कभी, भूल है जिंदगी।
 जिंदगी के हरेक पल को जी ले जरा।
 सांस गर थम गई, धूल है जिंदगी।

Friday, February 27, 2026

मुक्तक बुजुर्ग

जिन्हें रिश्ते निभाने की कभी, आदत नहीं होती।
दिलों में जिनके हरगिज़ भी,यहां उल्फत नहीं होती।
किसी की खुशियों का एक पल भी जो, कारण न बन पाते।
हां उनकी जिंदगानी में कोई, रहमत नहीं होती।

वे कैसे लोग हैं ज़ख्मों पे जो मरहम नहीं करते।
छिड़कते है नमक और ग़म में भी, जो ग़म नहीं करते।
जिन्हें औरों के जज्बातो से, लेना, और न देना कुछ।
नहीं हो स्वार्थ तो रिश्ता कोई कायम नहीं करते।
              ऋतु गोयल

Tuesday, February 17, 2026

मुक्तक संस्कार

खुशियों का सामान सज़ा कर रखते हैं।
घर में कुछ मेहमान बुला कर रखते हैं।
सभ्य हो रहे बच्चे दिन- ब- दिन ऐसे
कि बूढ़े माँ- बाप छिपा कर रखते हैं।

अक्सर उन पलकों पर नमी देखी है।
खुशियाँ हैं फिर भी गमी देखी है।
सज संवर के भी उदास दिखते हैं वे।
जिन्होंने मां-बाप की कमी देखी है।
                    ऋतु गोयल

अग्रसेन महाराज

तेरा हम वंदन करें,अग्रसेन महाराज।
सारे जग में दिख रहें,तेरे पावन काज।

इक रुपया इक ईट से,ऐसा बना समाज।
आपस के सहयोग से,पूर्ण हुए सब काज।

अग्रोहा एक वृक्ष है,सबको देता छाँव
भले कहीं कोई रहे,वहीं सभी का गांव

अग्रोहा एक तीर्थ है, क्यूं सब जाते भूल।
कर्म स्थल महाराज का,शीश लगाओ धूल।

लक्ष्मी पूजन सब करें,त्याग भाव है पाठ।
दान,धान्य,व्यापार से,घर-घर में हैं ठाठ।

तुझसे ही पहचान है,हम तेरी संतान।
साढ़े सत्रह गौत्र की,है तुझसे ही शान।

एक पिटारा दान का,ऐसा बाँधा साथ।
खाली ये होगा नहीं,बांटो दोनों हाथ।

अपने-अपने हित करें,परहित कैसे होय।
वो हो परहित कर सकें,जो निजहित न रोय।
      ऋतु गोयल