Monday, August 11, 2014

पेड़ और मैं

                       पेड़  और मैं 



तुम यूं झड़ गए पत्ता-पत्ता
जैसे कभी हरे ही न थे
चिडियां ,कौआ,तोता ,मैना और मैं
बोलो कहां जायेंगे
कैसे चहचहायेंगे
कौन बतायेगा की मौसम सुहाना है
 हवा में हिलोर है झूम- झूम के
तुम्हारे हरे- हरे पत्तों बीच हरे- हरे तोते
पीली -पीली चोंच वाली भूरी -भूरी मैना
जो बैठती हैं तुम्हारी शाखों पे
तुम्हें यूं निरीह देख कर डर न जायेंगी
मेरी आखों के रास्ते
दिल में रौशनी कर देने वाला तुम्हारा रंग
यूं उड़ा  देख कर बोलो
हौसला कहां से लाऊंगी
तुम्हीं तो हो अकेले
जब कोई नहीं होता
मेरे बेडरूम की खिड़की से बतियाने को
मेरे हर सुख-दुःख में हौसला दिलाने को
फिर आज तुम
यूं कैसे हो गएँ
ज़रा से पतझड़ में
अपना सब कुछ खो गएँ
तुमने ही तो कहा था


जब पीला पड. गया था
मेरा सारा वजूद एक बार
की वक़्त एक सा नहीं रहता
यह भी गुजर जायेगा
महकूंगी मैं
रोम –रोम
सांस -सांस

फिर
तुम भी हो जाओगे
ठूंठ से हरे
आयेगा बसंत खिलखिलाते
तुम्हारी हर शाख पर
लौटाने तुम्हारा रंग
हम सब
फिर से चहकेंगे
संग -संग

1 comment:

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