Monday, September 8, 2014

मुक्तक



          मुक्तक

दिल की पुकार दूरियों से कम नहीं होती
आँखें यूं बेवजह कभी भी नम  नहीं होती
आते न मेघ की तरह जीवन गगन में तुम
मेरी ह्रदय- धरा पे छमा छम नहीं होतीं

मुक्तक

            
            मुक्तक

प्यास जब मैं बनी बन गए नीर तुम
मैं बनी जब नदी बन गए तीर तुम
दर्द में डूब कर वक़्त ने जब लिखा 
मैं ग़ज़ल बन गई बन गए मीर तुम

देह जब मैं बनी बन गए चीर तुम
याद थी तो बने एक तस्वीर तुम
हाथ की इन लकीरों में तुम आ गए
और फिर बन गए मेरी तकदीर तुम 

तू महावर  मेरा, है मैं  रोली तेरी 
तू मेरा हास्य है , मैं ठिठोली तेरी
तू है आंगन मेरा, मैं रंगोली तेरी
तू मेरा फाग है, और मैं होली तेरी 

मुक्तक

              

             मुक्तक



बेशक सफ़र ये इतना भी आसान नहीं है
कांटों के बिना  भी तो गुलिस्तान नहीं है
पर मुश्किलें भी मुश्किलें हैं तब तलक ही दोस्त
जब तक कि तेरी चाह्तों में जान नहीं है


चल दोगे  तो सफ़र सुहाना हो जाएगा
मन के मुताबिक़ सब  मनमाना हो जाएगा
आज अकेला है लेकिन शुरूआत तो कर तू
तेरे पीछे दोस्त  ज़माना हो जाएगा

दिल में एक  प्रेम का कोना ना भूलना
गैरों के गम में तू कभी रोना न भूलना
बेशक बुलंदियों पे तेरा  नाम हो तमाम
मशगुल हो के आदमी होना न भूलना

पहले के जैसी अब ये कायनात नहीं है
बस दिल की चाह्तों की ही तो बात नहीं है
या भीड़ है ,या शोर है ,या कशमकश सी है
पर खुद से खुद की अब तो मुलाक़ात नहीं है


ये कैसे -कैसे दौर दिखाती है ज़िंदगी
हर काम तो मुश्किल ही बताती है ज़िन्दगी
दामन में भर के दर्द की ,आंसू की दौलते
 हंसने का हमसे स्वांग कराती है ज़िन्दगी

वो मुझसे  मुंह मोड़ गया है
 सारे नाते  तोड़ गया है
पर मैं कैसे उसको भूलूं
इतनी यादें छोड़ गया है

छोड़ गया वो कितना ही सामान यहाँ पर
कुछ अपनापन,कुछ अपनी पहचान यहाँ पर
बसने आया था दिल में जो जीवन भर को
आखिर वो भी निकला इक मेहमान यहाँ पर


मुक्तक

                  मुक्तक 


जीवन की समस्या के  निवारण नहीं होते
हर एक भावना के उचारण नहीं होते
पल -पल  को उत्सव की तरह जीना चाहिए
खुशियों को मनाने के कारण नहीं होते



कांटों से हार जाए ,वो  गुलाब नहीं है
हो सादगी से दूर वो  शबाब नहीं है
दुनिया में बहुत होंगे  ताजो -तख़्त शहंशाह
पर आपका जहान में जवाब नहीं है


प्यार है तो फिर  सहना  होगा
सुख हो या दुःख रहना  होगा
नदी को गर बनना है सागर
मुश्किल पथ पर बहना होगा


दो घड़ी को ये बिगड़ लेगा, संवर जाएगा
प्यार का घट अभी रीता है तो भर जाएगा
रात हो दिन हो अंधेरा हो या उजाला हो
वक्त फिर वक़्त है ,आखिर ये गुजर जाएगा
 

Sunday, September 7, 2014

धूप



      धूप


गरमाहाट
उतर आई अनगिनत किरणों  में बनकर धूप

धूप बस धूप भर नहीं
आलिंगन है
सूरज का

सर्दी  की कंपकंपाती देह को देता
 अपना प्यार
 अपार ...

जी लेती  हूं रोम -रोम
पूरी शिद्दत  से
कण -कण धूप को

क्या पता
कल ये धूप
 रहे न रहे
क्या पता
मैं कल
रहूं न रहूं