Tuesday, December 16, 2014

स्त्रियाँ




         स्त्रियाँ



तहखानों,तस्वीरों और संदूकों में
छिपा तो लेती हैं बहुत कुछ ...
पर छोड़ नहीं पाती 
इन्हें संभालना ,सजाना 
जब-तब सीने से लगा
 सुबकिया लगाना 
क्यूंकि
स्त्रियाँ अक्सर 
चीज़ें तो रख कर भूल जाया करती हैं 
पर कभी नहीं भूलती 
अपने रिश्ते,यादे , अहसास ..
ताउम्र ,तमाम सांस ...

कुर्सी



     कुर्सी


ओह! कुर्सी
तू ध्वस्त
वे मस्त
तू रक्षक
वे भक्षक
तू समय
वे असमय
तू डोले
वे सो रहे
तू चलन
वे बदचलन
तू दक्ष
वे भ्रष्ट
ऐ कुर्सी
तू मौन
लोकतंत्र की गढ़ी-मढी
कुछ तो बोल 

Monday, December 15, 2014

पहली बारिश

      

             पहली बारिश



झोंके, बूँदे, बारिश, छम -छम 
कितने नए -नए से हैं 
जैसे मेरी पहली -पहली बारिश हो 
महके मन की बहकी -बहकी ख्वाहिश हो 
जैसे कोई नई -नई सी लड़की 
भीग रही हो पहले -पहले सावन में 
वैसे मैं भी मौसम की हर बारिश में
नई -नई हो जाती हूँ मन ही मन में 
वो लड़की 
पहला -पहला प्यार गुनगुनाती है 
और मैं वही पुराना गीत दोहराती हूँ 
जैसे नया -नया हो प्यार 
पहली -पहली बारिश का 
वो लड़की 
फूल ,तितली ,गौरैया , बिजली बन जाती है 
और मैं ..
 सावन के  झूलें बन जाती हूँ
वही महक हथेलियों पर रचाती हूँ 
पहला -पहला 
दर्पण हो  जाती हूँ
वो लड़की अब भी मुझमें है 


हर सावन में आती है 
महकी -महकी 
बहकी -बहकी 
बिलकुल ताज़ा 
बिलकुल वैसी 
हर सावन में 
भीतर मन में 
एक अजब सी ख्वाहिश ले कर 
पहली -पहली बारिश ले कर 

राजनीति

               

  राजनीति 



राजनीति की सीलन पर
उग आये हैं कुकुरमुत्ते
मजदूर -किसान -दलित -महिला 
हवा -प्रकाश -जल -खाद्द हैं 
घास दूब सी है जनता
जो हरियाली ला सकती है
पर  अंधेर नगरी में 
कैक्टस की अफसरशाही है  
बासी, उबाऊ ,सीलन वाले
कुकुरमुत्ते को नहीं मालूम 
कैसे जिया जा सकता है 
ताज़ा हवा 
चमकती धूप में 
इसलिए 
वे जीते हैं 
वर्षों से वोट मांगती 
बस बासी आदत की तरह  

सच...सच कहता है

               

 सच ..सच कहता हूँ



मैं आईने में 
अपना नहीं 
उनका देखता हूँ प्रतिबिम्ब 
परछाई में मेरे 
उग आई हैं सींग 
धीरे -धीरे बन्दर में बदलता 
नकलची मानव हूँ
चील व बाज हूँ
मौकापरस्त मंडराता 
इधर-उधर 

क्या ढूंढ रहा हूँ मैं 
उनमें से उनको 
या खुद में से खुद को 
लिबासों में छिपता फिर रहा हूँ
फिर भी कितना उघाड़ा हूँ

किसी दूकानदार से कम कहां हूँ मैं 
अपनी बातों को सजाता चमकाता हूँ
थोड़ा शर्माता हूँ थोड़ा भय खाता हूँ 
खुद को हू-ब-हू कैसे धर दूं 
सब के सुर  में सुर मिलाता हूँ  

अनुभूतियों के बिना भी भरता  हूँ कागज़ 
शब्द मेरी पूजा है 
पर शब्दों में मौजूद ही कहाँ हूँ 
इसलिए 
हर दिन जन्मता 
हर दिन मरता हूँ  
सच 
हक़ीकत के सिवा 
सब कुछ करता हूँ


बाबूजी

                

      बाबू जी 

तुम्हारी दुआ 
इतनी असरदार हो जायेगी 
मेरे नाज़ो-नखरे उठाएगी 
ये सोचा न था 
जब दहल उठता था मन 
तुम्हारी डाट के डर से बाबू जी 
और वो डर इतना जरूरी बन जाएगा 
मुझको गलत करने से 
अब तक बचाएगा 
ये सोचा न था 
जब तुम साथ थे मेरे बाबू जी 
और दूर हो के भी 
तुम करीब हो जाओगे 
मेरे हर ज़िक्र में यूं आओगे 
ये कब सोचा था 
जब जा रहे थे 
छोड़ कर 
तुम बाबू जी 

इंतज़ार


 इंतज़ार


जानती  हूँ
यह तुम्हारी दस्तक नहीं
बस हवा का झोका है 
जो मेरा दरवाज़ा खटखटा गया 
पर जानते हुए भी 
एक बार 
दरवाज़ा खोल कर 
देख लेने को करता है जी 
की कहीं तुम  बाहर 
शायद कर रहे हो 
मेरा इंतज़ार
पर डरती हूँ
तुम वहां नहीं हुए तो 
बंद दरवाज़े के भीतर आने वाली 
हर आहट
तुम्हारे होने का अहसास 
करवाती है मुझे 
और इंतज़ार
तुम्हारी 

दस्तक का 

घर के नहीं होते पर ...




 घर के नहीं होते पर ...



मैं नहीं उड़ना चाहती
नहीं छोड़ना चाहती
अपनी ज़मीन
मैं तो समेट लिया करती हूँ
अपनी इच्छाओं के पंखों में
अपना छोटा सा आंगन
और यहीं उतार देती हूँ
अपने सपनों का चांद
आसमान यहीं
बुला लिया करती हूँ
विचरने को
धरती पर खुशनुमा
 रंग भरने को
सितारे खुद उतर आते हैं
मुझे रौशन करने
मेरी तकदीर बनने
क्योंकि
वे सब जानते हैं
मेरी उड़ान में
बंधा है घर
और घर के कब
होते है पर ...

शहर

                    

   शहर



शहर की छाती पर आदमी चढ़ा है
या आदमी की छाती पर शहर खड़ा है
समझ नहीं आता
दोनों एक दूसरे को
कूढ़न ,चिंताएं बांटते हैं
बस जड़े काटते हैं
आदमी शहर में है
और शहर आदमी में
पर दोनों तन्हा हैं
दरअसल दोनों के अन्दर बवंडर है
दोनों ही खँडहर हैं
शहर में आबादी है
पर आबाद नहीं
भीड़ है
पर संवाद नहीं
दोनों सीढ़ी हैं
एक दूसरे के विकास की
पर विकसित हो कर भी
दोनों खुश नहीं
कैसा समीकरण है
बड़े-बड़े शहर में
आदमी गाँव ढूँढता है
और शहर
एक मामूली आदमी  

मुर्दाघर


 मुर्दाघर



अँधेरी गुफा
गुफा में मुर्दाघर
जहां एक भी साबूत लाश नहीं
अलग -अलग चोट
अलग -अलग दर्द
चीख ही चीख
ऐसे शमशान में
शैतान सर धुनता
अंगों को समेट
अर्थियाँ सजा रहा है
शैतान हो के भी
आंसू बहा रहा है
एक के बाद एक
आवारा अंग चले आ रहे हैं
मरो मारो यहीं चिल्ला रहे हैं
जो सबूत लाशें हैं भी
भयावह हो रही हैं
इंसानियत खो के
कहर ढो रही हैं
सकते में है शैतान
ये इंसान है या हैवान
ह्त्या-ह्त्या -ह्त्या
और आत्महत्या
सांसो का सिलसिला ख़तम हो रहा है


खुद मरो या मारो सितम हो रहा है
सभ्य दुनिया
असभ्य हो गई है
शैतान तक को
क्षम्य हो गई है
इंसानियत परेशान है
हैवानियत हैरान
  

Saturday, December 13, 2014

सड़क

                  


 सड़क



टूकड़ा-टूकड़ा सड़क
कूड़े के ढेर में मुंह छिपाती सड़क 
भीड़ को ढोए हुए जर्जराती  सड़क 
ट्रेफ़िक के बोझ से धंसी -धंसी सड़क 
शोर व कोलाहल से फटी -फटी सड़क 
जुलूस व जलसे से भरी -भरी सड़क 
बलात्कारियों से डरी-डरी सड़क 
लूट और खसोट व हादसाई सड़क 
ह्त्या ,एक्सीडेंट से दहलाई सड़क 
लम्बी लाल बत्तियों से कलंकित सड़क 
बड़े-बड़े वाहनों से आतंकित सड़क 
निर्माण योजनाओं की लपेट में है सड़क 
नेताओं की जेब की चपेट में है सड़क 



किताब



   किताब 

मेरी धड़कनो के करीब 
सीने से लग जाती हो 
मेरी तन्हाई में 
सहचरी बन आती हो 
और 
महकता है आज भी 
तुममें यादों का गुलाब 
कितनी प्यारी हो किताब ....


बारिश नहीं कुछ और


बारिश नहीं कुछ और...



बारिश के पानी से धरती का
कण-कण भीग रहा है 
काले घने बादलों से
सांझ को ही हो गई रात
व्यस्त सड़के सुस्ता रही हैं
ऐसे में मैं लिखती हूँ....
गरमागरम पकौड़ो की
सुगंध है बारिश
तो कहीं
ठिठुरन है बारिश
कांच की खिड़कियों से
बारिश को निहारना
कागज़ की नाव बनाना
मन का हौले -हौले गुनगुनाना
बारिश है
पर
झोपड़ो की छतों से
पैबंदो का फट जाना
फुटपाथ पर जीवन का
 डर कर सहम जाना
बारिश नहीं

कुछ और है..

तुम भी तो जीओ



        तुम भी तो जीओ 

यह
सावन
यौवन
दर्पण
मैंने भी जिए हैं
तुम भी तो कुछ
उल्लास जी लो
बिटिया
कुछ ख़ास जी लो
उम्र भर का
अहसास जी लो


लक्ष्मीबाई



             लक्ष्मीबाई

घर से दफ़्तर
और 
दफ़्तर से घर के बीच 
जब देखती हूँ
मूरत 
रानी लक्ष्मीबाई की 
तब मुझको भी लगता है 
आसान 
रिश्तों को कांधे पर सहेजे हुए
मातृत्व को कलेजे से लपेटे हुए 
वाकर ,स्मिथ ,हूरोज़ 
जैसो से लड़ना
हर मुश्किल में 
आगे बढ़ना

कमी

दीदी

         
                    दीदी 

ताउम्र
यूँ रूठी रही
हाथों की रेखाएं उनसे
कि वक्त से पहले ही
ढलने लगी थी वह
मोम सी
पिघलने लगी थी वह
लाठी सी पतली हो गई थी
गोल मटोल कद काठी उनकी
गठरी सी सिमटती चली गई
जिसे मिटना कहते है
वैसे तिल-तिल
मिटती चली गई

और जब नहीं रही
तो तय था
छोड़ तो गई
हम सबको
अपनी दर्द भरी कहानी
पर उससे भी कही ज्यादा
हौसले से
जीने के तौर तरीके
और
कोई कैसे जीये
इतने दर्द
इतने हौसले
इतने  सलीके


उड़ान


         उड़ान

 बेशक
 तुमने सीख लिया
ज़मी से आसमा उड़ना
अपने दाने चुगना
तिनका -तिनका
नीड़ बना लेना
पर मैं
कहां सीख पाई
तुमको
तुम्हें
सौप देना 

कविता



         कविता 

कविता तू तड़प रही है
अपने जनम के लिए
किन्तु बहुत सी तैयारियाँ शेष हैं
प्रसव के पहले
तू इंतज़ार कर कुछ और
मेरे भावों को धमनियों में
उमड़ने-घुमड़ने दे
मेरे रक्त मज्जा से खुद को
और सनने दे
जनम देना इतना सहज नहीं
और शब्दों का जनम नौ महीने क्या
नौ वर्ष भी लेंगे
जितना तड़पेगी भीतर तू
उतने युगों तक जियेगी
कविता
मुझे भावों का दर्द अभी
और सहने दे
इस प्रसव पीड़ा को
और रहने दे 

Saturday, October 25, 2014

तुम व्यस्त हो.....

                                   
            
 तुम व्यस्त हो.....




आज मूड तो नहीं था कि
 ब्रेकफास्ट के बाद
तुम्हारा लंच भी पैक करूं
और छोड़ने आऊं तुम्हे बाहर तक
आँफिस के लिए
मुस्कान ओढ़े
क्यूंकि
मेरी फुर्ती में रात भर की करवटो का असर
और आंखों में एक चुभन सी थी
जो आईना नहीं
बस तुम देख सकते थे
पर तुम व्यस्त थे


आज बिलकुल नहीं था मूड
बच्चों को बस स्टॉप छोड़ कर आने का
उनके उलझे उत्सुक मनों को सुलझाने का
क्योंकि खुद उनसुलझे थे कुछ प्रश्न
मेरे रक्त प्रवाह में
जिसे और कोई नहीं
बस तुम सुलझा सकते थे
पर तुम व्यस्त थे



आज बहुत गरमी थी
ढुलक रहा था पसीना इस्त्री करते हुए
जल रही थी किचन में गैस सी
भाप बन रहे थे भाव
पर किस पर झुंझलाती
किससे कहती
तुम तो खुद ही उबल रहे थे
बहुत व्यस्त थे

आज स्कूल भी गई थी मैं
पेरेंट्स- टीचर्स मीटींग अटेंड करने
और सारी शिकायते सारा ज़िम्मा
ढो लाई थी अपने
घर के जरूरी सामान के साथ
देर तक दुखते रहे थे मेरे हाथ
चाहती थी तुमसे कहती
तुम साथ चलते
पर तुम से क्या
तुम  खुद ही व्यस्त थे

आज बहुत धड़का था मन शाम को
काश की तुम होते
ले चलते मुझे लांग ड्राइव पर
कुछ लम्हों  को ही सही
भर देते मुझमें ज़िंदगी
थाम के मेरा हाथ
कहते कि तुम हो साथ
इसीलिए फ़ोन भी किया था तुम्हें
पर बिन सुने ही तुमने कह दिया था
की मैं व्यस्त हूँ

जानते हो आज  रात बहुत काली है
नींद नहीं आ रही
चाहती हूँ ढेर सारी करूं बाते
सिर्फ मेरी और तुम्हारी
तुम्हारे आगोश में सब कुछ भूल पाऊँ
कतरा- कतरा खुशबू सी बिखर जाऊँ
रौशन कर दूं इस रात को
ताज़ा -ताज़ा नई -नई हो कर
पर सो रहे हो तुम
कैसे जगाऊँ

कोई नहीं
जी लूंगी तुम्हारे हिस्से का भी वक्त
ज्यों जी रही हूँ पल-पल
खुद में
एक पुरुष
खुद से इतर

पर काश.....
तुम भी तो जीते
थोड़ी सी औरत
अपने भीतर

Monday, September 8, 2014

मुक्तक



          मुक्तक

दिल की पुकार दूरियों से कम नहीं होती
आँखें यूं बेवजह कभी भी नम  नहीं होती
आते न मेघ की तरह जीवन गगन में तुम
मेरी ह्रदय- धरा पे छमा छम नहीं होतीं

मुक्तक

            
            मुक्तक

प्यास जब मैं बनी बन गए नीर तुम
मैं बनी जब नदी बन गए तीर तुम
दर्द में डूब कर वक़्त ने जब लिखा 
मैं ग़ज़ल बन गई बन गए मीर तुम

देह जब मैं बनी बन गए चीर तुम
याद थी तो बने एक तस्वीर तुम
हाथ की इन लकीरों में तुम आ गए
और फिर बन गए मेरी तकदीर तुम 

तू महावर  मेरा, है मैं  रोली तेरी 
तू मेरा हास्य है , मैं ठिठोली तेरी
तू है आंगन मेरा, मैं रंगोली तेरी
तू मेरा फाग है, और मैं होली तेरी 

मुक्तक

              

             मुक्तक



बेशक सफ़र ये इतना भी आसान नहीं है
कांटों के बिना  भी तो गुलिस्तान नहीं है
पर मुश्किलें भी मुश्किलें हैं तब तलक ही दोस्त
जब तक कि तेरी चाह्तों में जान नहीं है


चल दोगे  तो सफ़र सुहाना हो जाएगा
मन के मुताबिक़ सब  मनमाना हो जाएगा
आज अकेला है लेकिन शुरूआत तो कर तू
तेरे पीछे दोस्त  ज़माना हो जाएगा

दिल में एक  प्रेम का कोना ना भूलना
गैरों के गम में तू कभी रोना न भूलना
बेशक बुलंदियों पे तेरा  नाम हो तमाम
मशगुल हो के आदमी होना न भूलना

पहले के जैसी अब ये कायनात नहीं है
बस दिल की चाह्तों की ही तो बात नहीं है
या भीड़ है ,या शोर है ,या कशमकश सी है
पर खुद से खुद की अब तो मुलाक़ात नहीं है


ये कैसे -कैसे दौर दिखाती है ज़िंदगी
हर काम तो मुश्किल ही बताती है ज़िन्दगी
दामन में भर के दर्द की ,आंसू की दौलते
 हंसने का हमसे स्वांग कराती है ज़िन्दगी

वो मुझसे  मुंह मोड़ गया है
 सारे नाते  तोड़ गया है
पर मैं कैसे उसको भूलूं
इतनी यादें छोड़ गया है

छोड़ गया वो कितना ही सामान यहाँ पर
कुछ अपनापन,कुछ अपनी पहचान यहाँ पर
बसने आया था दिल में जो जीवन भर को
आखिर वो भी निकला इक मेहमान यहाँ पर


मुक्तक

                  मुक्तक 


जीवन की समस्या के  निवारण नहीं होते
हर एक भावना के उचारण नहीं होते
पल -पल  को उत्सव की तरह जीना चाहिए
खुशियों को मनाने के कारण नहीं होते



कांटों से हार जाए ,वो  गुलाब नहीं है
हो सादगी से दूर वो  शबाब नहीं है
दुनिया में बहुत होंगे  ताजो -तख़्त शहंशाह
पर आपका जहान में जवाब नहीं है


प्यार है तो फिर  सहना  होगा
सुख हो या दुःख रहना  होगा
नदी को गर बनना है सागर
मुश्किल पथ पर बहना होगा


दो घड़ी को ये बिगड़ लेगा, संवर जाएगा
प्यार का घट अभी रीता है तो भर जाएगा
रात हो दिन हो अंधेरा हो या उजाला हो
वक्त फिर वक़्त है ,आखिर ये गुजर जाएगा
 

Sunday, September 7, 2014

धूप



      धूप


गरमाहाट
उतर आई अनगिनत किरणों  में बनकर धूप

धूप बस धूप भर नहीं
आलिंगन है
सूरज का

सर्दी  की कंपकंपाती देह को देता
 अपना प्यार
 अपार ...

जी लेती  हूं रोम -रोम
पूरी शिद्दत  से
कण -कण धूप को

क्या पता
कल ये धूप
 रहे न रहे
क्या पता
मैं कल
रहूं न रहूं

Friday, August 22, 2014

तुम यूँ ही आया करो ....

तुम यूँ ही आया करो ....


तुम यूं ही आया करो
रोज़ तड़के -तड़के
अलार्म बनके

क्यूंकि जिस दिन तुम आती हो ना
भोर बन के
उस दिन शाम ढले भी आंखों में
 रौशनी पसरी रहती है

और जब
तुम करती हो न ची-ची ,ची-ची
तो शोर में भी
कोई गीत गुनगुनाता है

क्यूंकि
अलार्म, मोबाइल ,डोर बेल
जगा तो देते हैं मुझे
पर तोड़ नहीं पाते
मेरी नींद
भर नहीं पाते मुझमें
कुछ और

पर तुम भरती हो मुझमें
चिड़िया
नन्हीं सी होकर
बड़ा सा आसमान



Monday, August 11, 2014

पेड़ और मैं

                       पेड़  और मैं 



तुम यूं झड़ गए पत्ता-पत्ता
जैसे कभी हरे ही न थे
चिडियां ,कौआ,तोता ,मैना और मैं
बोलो कहां जायेंगे
कैसे चहचहायेंगे
कौन बतायेगा की मौसम सुहाना है
 हवा में हिलोर है झूम- झूम के
तुम्हारे हरे- हरे पत्तों बीच हरे- हरे तोते
पीली -पीली चोंच वाली भूरी -भूरी मैना
जो बैठती हैं तुम्हारी शाखों पे
तुम्हें यूं निरीह देख कर डर न जायेंगी
मेरी आखों के रास्ते
दिल में रौशनी कर देने वाला तुम्हारा रंग
यूं उड़ा  देख कर बोलो
हौसला कहां से लाऊंगी
तुम्हीं तो हो अकेले
जब कोई नहीं होता
मेरे बेडरूम की खिड़की से बतियाने को
मेरे हर सुख-दुःख में हौसला दिलाने को
फिर आज तुम
यूं कैसे हो गएँ
ज़रा से पतझड़ में
अपना सब कुछ खो गएँ
तुमने ही तो कहा था


जब पीला पड. गया था
मेरा सारा वजूद एक बार
की वक़्त एक सा नहीं रहता
यह भी गुजर जायेगा
महकूंगी मैं
रोम –रोम
सांस -सांस

फिर
तुम भी हो जाओगे
ठूंठ से हरे
आयेगा बसंत खिलखिलाते
तुम्हारी हर शाख पर
लौटाने तुम्हारा रंग
हम सब
फिर से चहकेंगे
संग -संग

Monday, May 12, 2014

(दोहे) माँ

                                                                
      (दोहे) माँ


         तेरी जैसी मैं दिखूं सब लेते पहचान
     हस्ताक्षर तेरा कहे मुझको सकल जहान
           
     कुछ था मीठा चूरमा उस पर मीठा हाथ
     माँ बेटी  यूं घुल रही घी शक्कर ज्यों साथ

     सदा छिपाती ही रही सबसे अपनी पीर
     हर कडवाहट दूर कर स्वाद पकाती खीर

     माँ ने हरदम ही करी अपनी माँ की बात
     अब मैं उसकी बात को याद करूं दिन रात

     दीदी की हर बात को तुम देती थी काट
     मैं छोटी थी इस लिए बस मेरा था ठाट

     माँ जब से तुम रूठ कर चली गई हो दूर
     मैं तन मन से यूं जलूं जैसे जले कपूर

     खुशबू माँ के जिस्म की ममता के संवाद
     मैं हिरणी सी हो गई माँ कस्तूरी याद