Thursday, June 25, 2009

्सिर्फ़ जुगनू हो तुम

तुम सिर्फ़ एक जुगनू हो
लौ नहीं
जो राह दिखा सको
सूरज नहीं
जो अंधेरा मिटा सको

स्वंम दिशा भ्रमित
अन्धेरे को टटोलते मंडरा रहे हो
तुम्हारी दुम से निकलती रोशनी
आतिशबाजी से ज्यादा कुछ भी नहीं

तुम मृगतृश्ना हो
जो सन्ताप और छ्टपटाहट
के अलावा कुछ नहीं दे सकते
वो रंगमन्च हो
जो पर्दा बन्द होते ही बदरंग हो जाता है
फिर मैं तुम्हारा क्यूं अनुसरण करूं

तुम पलक झपकते ही कहीं खो जाओगे
और मैं
अंधेरे का सन्नाटा बन जाऊंगी
इसीलिये
अस्वथामा जैसे सत्य का शिकार नहीं होना चाहती
मुझे तलाश है
सम्पूर्ण सत्य की
जिसमें स्थायित्व हो,पूर्णता हो
जिसके सत्य होने में भी सत्यता हो

ऐसी  तलाश में
मुझे अंधेरे से लड़ना है
बहुत दूर अकेले चलना है
तुम जैसे
जुगनूओं के पिछे नहीं
मुझे तो
मशाल बन खुद जलना हैं

Tuesday, June 9, 2009

एस॰एम॰एस, ई मेल और हमारा मन




एस.एम.एस व ई मेल 


यूं तो कुछ मिनटों में ही पँहुच जाते हैं अब
अपनी संवेदनाएँ व भावनाएँ प्रकट करने
हमारे एस॰एम॰एस॰
और कभी ई-मेल के माध्यम से भी
एक दूसरे के बारे में जान लेते हैं हम
और इसी को दोस्ती, प्रेम
 न जाने क्या-क्या मान लेते हैं हम
पर सच तो यह है कि
अब हम एक दूसरे के बारे में जानते ही कहाँ है
क्योंकि
जब भी मैं खेलना चाहती हूँ बारिश की बूंदों से
ठीक उसी वक्त उनका एस॰एम॰एस॰
अपनी तरक्की में व्यस्त होने की खबर सुनाता है
जिस दिन में मैं रोना चाहती हूं
उनके कांधे पे सर रख के
तो मेरा उस दिन वाला एस॰ एम॰ एस॰ दूसरे दिन
देर से ही डिलीवर हो पाता है
जब मेरी आँखें भीग रही होती हैं गहरे दुख में
तब आंसू पौंछने वे नहीं उनका चुटकिला  सा
मैसेज़ आता है
और जब भी मैं भेजना चाहती हूं कोई मनचला
सा मैसेज़ उनको अपने मोबाइल से
तो ठीक उसी वक्त उनका कोई फारवार्डेड गायत्री मंत्र
मुझ तक पँहुच जाता है
इस तरह
हम एक दूसरे तक पँहुच कर भी पँहुच नहीं पाते हैं
क्योंकि अब हम
एस॰एम॰एस॰ व ई मेल के माध्यम से
ही करीब आते हैं
अपनी तरक्की में व्यस्त हम
कम्प्यूटर व मोबाइल के की-पैड व बटनों
में उलझे यह भूल गए हैं कि
आँखों के आँसू, जिस्म का बुखार
होठों की थरथराहट, दिलों की पुकार
को अब भी
उंगलियों की छुअन, धड़कता हुआ मन
साँसों की गरमाहट, दहलीज पर आहट
भावनाओं को अभिव्यक्ति
हर व्यक्ति को एक व्यक्ति
की आवश्यकता है
किसी बेजान यन्त्र की नहीं
क्योंकि
कम्प्यूटर व मोबाईल प्रेम की भाषा नहीं जानते
हाँ प्रेम की भाषा
वो कबूतर समझता था जो लाता ले जाता था
प्रेमियों के खत संभाल के
वो डाकिया जानता है
जो सूंघ लेता है बन्द लिफाफ़ों से
शब्दों में बिखरी ढेर सारी खुशबू
इसी लिये गलत पते वाली चिट्ठी भी
सही जगह पहुंचाने को करता है जुस्तजू
हां प्रेम की भाषा मौसम जानता है
क्योंकि
उसमें धड़कता मन होता है
पर ये कम्प्यूटर और मोबाईल क्या समझेंगे
इनमें तो डिलिट का बटन होता है


बाल मजदूर







बाल मजदूर

जब से देखा है
उसकी आखों में पथराये सपनों को
उसकी धड़कन में बसे अपनों को
तब से मेरे एहसास मेरा मज़ाक उडाने लगे हैं
सारी दुनिया के खि्लौनें मुझे मुंह चिढ़ाने लगे हैं

जब भी किसी मां की छाती में भूख से दूध नही उतरता
बाबा के खेत में जुत जाने पर भी बच्चों का पेट नहीं  भरता
जवां बेटी के हाथों में हल्दी सजानी हो
घर के नन्हें मुन्नों की भूख मिटानी हो
तब वो मां अपने नैन दुलारे को
बाबा अपने प्रिय सहारे को
खुशी- खुशी भेज दिया करते हैं ऎसी जगह
जहां उनका सलोना
स्वयं  बन जाता है खिलौना
और चाबी भरते ही
कभी बर्तन मलता कभी कू्ड़ा बीनता
कभी चाय पिलाता कभी रोटी खिलाता है
और कभी रंग बिरंगे गुब्बारों के साथ बेच देता है
अपने हसीन सपने
 कार में बैठे दूसरे बच्चों को

जब कभी भूल कर उसके सपने में आ जाती हैं परियां
तो मांग लेता है अपने छोटे भाई बहनों के लिए
अपनी सबसे मनपसंद चीज़
 जिसका वो नाम नही जानता

और जब नींदों में आती हैं
तो लोरी नहीं घर की भूख सुनाती है मां
ताकि दूसरे दिन वो फ़िर ज़िंदा हो सके
नन्हें कंधों पे ज़िम्मेदारियां ढ़ो सके

Wednesday, June 3, 2009

महज़ एक किताब



महज़ एक किताब

तुम
जब- जब नहीं थे करीब
मेरी मनकही  के लिए
तब- तब  जन्म लेती रही कविता

आज
जब इस किताब को लोग
मेरी कविताओं का संकलन कह रहे हैं
कहती हूं इसे मैं
तुमसे दूर
एक गुलदस्ता
तुम्हारी यादों का


इसकी  एक- एक कविता
तुम्हारे बिन गुजारे
पल - पल की दास्तां है

इसे
फ़ुरसत मिले तो
 तुम भी पढ़ लेना
समझ कर
महज़ एक किताब


शहरवास

इस शहर के तमाम
मोटर इमारत रेस्तरां बाज़ार प्रसाधनों से कह दो कि
एक बार जाने दे मुझे
झरनें,पहाड, नदियां, सागर, अम्बर के करीब

कह दो मेरे प्रिय से कि एक बार ले चले फिर वहां
जहां मैं और वो हो अकेले
मुझे नहीं देखने दुनिया के मेले

मत भरो मुझ में जबरन सांसें
भरना हो तो भरो
वो हंसी वो खुशी वो प्यार
मेरे सपनों का संसार
जहां शकुन्तला और दुष्यंत
एक दूसरे में संगीत भरते हैं
रोज़ नये गीत रचते हैं
जहां प्रेम का इतिहास रचा जाता है
सृष्टि का शिल्प गढ़ा जाता है
जहां कल्पनाओं की सीमायें नहीं होती
दुनिया भर की बाधायें नहीं होती
इंसान,इंसान से  प्यार करता है
एक दूसरे का आभार करता है
मनगढंत रीत नहीं है
हार और जीत नहीं है
जहां होता है
प्यार प्यार और प्यार
ऐसी दुनिया में पहुंचा दो मुझे

मुझे मत दो शहरवास
जहां सब कुछ हैं
पर दिलों में एहसास नहीं है
प्रेम की प्यास नहीं है
कहो
क्या ये शहर मुझको वनवास नहीं है

औरत


       औरत

सारे घर को खिला देने के बाद
अपने लिये रोटियां
 कभी गोल नहीं बना पाती वह

ऐसा नहीं कि उसने कभी कोशिश नहीं की
पर रोटियां बेलते हुए
उन्हें आकार देते हुए
उसे बार-बार ये ध्यान आ जाता है
कि उसके कितने ही सपनों ने
 आकार खो दिये हैं
जिन्हें साकार करने की
 इच्छा तक
व्यक्त नहीं कर पाई वह
तो क्या फर्क पडता है
घर भर  की भांति
 रोटियां उसकी
गोल हो या आकारहीन
पेट तो भरता ही है 

मुक्तक

मन के मरुथल में भी अब के बरसात हो
आग हैं हर तरफ़ प्यार की बात हो
भर सके रोशनी इस जहां में सदा
इस तरह की कोई चांदनी रात हो

मौत सच हैं मगर ज़िंदगी देखिये
आग मत देखिये रोशनी देखिये
चांद को देखना हो अगर आपको
दाग मत देखिये चांदनी देखिये

Tuesday, June 2, 2009

पिता















पिता

जो दुखों की बारिश में छतरी बन तनते हैं
घर के दरवाज़े पर नजरबट्टू बन टँगते हैं
समेट लेते हैं सबका अंधियारा भीतर
खुद आंगन में एक दीपक बन जलते हैं
ऐसे होते हैं पिता

बेशक
पिता लोरी नहीं सुनाते
माँ की तरह आँसू नहीं बहाते
पर दिन भर की थकन के बावजूद
रात का पहरा बन जाते हैं

जब निकलते हैं  सुबह तिनकों की खोज में
किसी के खिलौने, किसी की किताबें
किसी की मिठाई, किसी की दवाई
परवाज़ पर होते हैं घर भर के सपने
पिता कब होते हैं खुद के अपने

जब सांझ ढले लौटते हैं घर
माँ की चूड़िया खनकती हैं
नन्हीं गुड़िया चहकती है
सबके सपने साकार होते हैं
पिता उस समय अवतार होते हैं
जवान बेटियाँ बदनाम होने से डरती हैं
हर गलती पर आंखों की मार पड़ती हैं
दरअसल
भय, हया, संस्कार का बोलबाला हैं पिता
मोहल्ले भर की ज़ुबा का ताला हैं पिता

सच है
माँ संवेदना हैं पिता कथा
माँ आँसू हैं पिता व्यथा
माँ प्यार हैं पिता संस्कार
माँ दुलार हैं पिता व्यवहार
दरअसल पिता वो-वो हैं
जो-जो माँ नहीं हैं
माँ जमी तो पिता आसमाँ
यह बात कितनी सही है

पिता बच्चों की तुतलाती आवाज़ में भी
एक सुरक्षित भविष्य हैं
जिनके कंधों पे बच्चों का बचपन होता है
जिनकी जेब में खिलौनों का धन होता है
जिनकी बाजुओं से जुटती है ताकत
जिनके पैसों से मिलती है हिम्मत
जिनकी परंपराओं से वंश चलता है
पिता बिन बच्चों को कहां नाम मिलता है

पिता
वो हिमालय है जो घर की सुरक्षा के लिए
सिर उठा, सीना तान के तना होता है
पिता बिन घर कितना अनमना होता है

पिता हो तो घर स्वर्ग होता है
पिता ना हो तो उनकी स्मृतियाँ भी अपना फ़र्ज निभाती हैं
पिता की तो तस्वीर से भी दुआएँ आती हैं







मां










माँ



मुर्गे की बांग से रात के सन्नाटे तक
बाज़ार के सौदे से घर के आटे तक
बापू की चीख से बच्चों की छींक तक
सपनों की दुनिया से घर की लीक तक
माँ खुद को भुलाकर बस माँ होती थी
बिन मांगी एक दुआं होती थी

रोशन घर को देख कर
कभी किसी को ख्याल नहीं आता कि
इसके पीछे मोमबत्ती सी जलती मां है
पल पल पिघलती मां है
सब बेखबर
उससे परियों की कहानियां सुनते
आंचल से खुशियां चुनते
और मां चक्करर्घिरनी सी घूमती जाती
खुद अनकही पर सब की सुनती जाती

मां जब उदास होती
एक बात बडी खास होती
वह बापू से दूर दूर रहती
पर बच्चों के और पास होती

मां ने नही मांगा कभी/स्वर्ण कमल
सोने का हिरण ,कोई चमकती किरण
माँ को चाहिए था वो घर
जहां थे उनके नन्हें -नन्हें पर 
जिन्हें उड़ना सिखाना था 
आसमां दिखाना था
पर जब वे उड़ान भरने लगे
ज़मी से ही डरने लगे
मां का हर पंख उडते हुए मां से ही दूर जाने लगा
और वो घर जिसे मां ने बोलना सिखाया था
उसी का सन्नाटा मां को खाने लगा

खुद मिट कर जिनको जीना सिखाया
पग- पग पर जिन्हें संभलना सिखाया
जिनका झूठा खाया, लोरी सुनाई
बापू से जिनकी कमियां छिपाई
रात भर सीने से लगा चुप कराती रही
बच्चों का पेट भर हर्षाती रही
दो पाटों के बीच सदा पिसती रही
आँखों से दर्द बनकर रिसती रही
बापू के हज़ार सितम झेलती थी पर
बच्चों के खातिर कुछ ना बोलती थी मां
ऐसी खुशियां लुटाने वाली मां को
कभी कोई खुशी नही मिली
जिस मां से रोशन था सारा घर
उस मां के जीवन की सन्ध्या को
आखिरकार  रोशनी नहीं मिली

सूने घर की दिवारें 
मां के होठों पे चुप्पियां बो गई
और सबको रौशन करने वाली मां

अंतत: अंधेरों में खो गई

बेटियाँ









बेटियाँ गुलज़ार होती हैं
बेटियाँ बस प्यार होती हैं
बेटियाँ घर छोड़ जातीं जब
खुशियॉ सब उस पार होतीं हैं
बेटियों से हर घड़ी पावन
बेटियों से ज़िन्दगी सावन

बेटियों के सुर ही तन-मन में
प्राण बन के बसे होते हैं
बेटियाँ घर-घर की वीणाएँ
तार जिनके कसे होते हैं
गूँजती फिर भी मधुरता बन
बेटियाँ संगीत मनभावन
बेटियों से ज़िन्दगी सावन

धूप से हरदम बचाएँ जो
बेटियाँ वो छाँव होतीं हैं
झूमते दिन रात पेड़ों के
नृत्य करते पाँव होतीं हैं
बेटियों से महकता उपवन
बेटियों से घर हैं वृंदावन
बेटियों से ज़िन्दगी सावन


बेटियाँ जब जन्म लेतीं हैं
जन्म दे क्यूं माएं रोतीं हैं
बेटियों को कोख में मारे
बेटियों से दुनिया होती हैं
रुक गई जो इनकी ही धड़कन
रच सकोगे क्या धरा नूतन
बेटियों से ज़िन्दगी सावन

देह धर कर आ गया है जो
बेटी नयनों का वहीं सपना
सपना वो जो सबसे अपना है
फिर भी वो होता नहीं अपना
छोड़ जाती खुशबू तन-मन की
बेटियाँ हैं या हैं ये चन्दन
बेटियों से ज़िन्दगी सावन

बेटियाँ मधुमास होतीं हैं
दूर हो के पास होतीं हैं
बेटे घर के दीप हैं माना
बेटियाँ अरदास होतीं हैं
जो सदा करतीं जहां रोशन
बेटियाँ हैं भोर का वंदन
बेटियों से ज़िन्दगी सावन