न जाने कितने शब्दों में से कुछ शब्द ही काफ़ी है
हमारी अभिव्यक्ति के लिये
बल्कि शब्द ही नहीं साथ होना भर ही काफ़ी है
व्यक्ति के लिये
अह्सास कोई भाषा नहीं मांगता
प्यार है तो जताना आ ही जायेगा
थोड़ा चुप रह कर तो देखो सच मज़ा आयेगा
पेड़ों की लम्बी कतार कितनी अनुशासित है
चुप रह कर भी खुद ब खुद परिभाषित है
सूरज,चांद,सितारों की चुप्पी तक चमकती है
चुप रह कर तो ओस की बूंद तक छलकती है
कुछ खास नहीं किया है शब्दों ने
प्यार को प्यार है कह कर कमज़ोर ही किया होगा
झरनें,पहाड़ ,नदियों को बस कोलाहल ही दिया होगा
मेरे भीतर एक संगीत है
मौन का
पर उसे सुने कौन
सारा वक्त तो शब्दों को सुनने सुनाने में लग जाता है
और मेरे भीतर का संगीत भीतर कहीं भीतर और भीतर
दब जाता है
आओ इसे सुनने के लिये
हम रहे कुछ दिनों मौन
ताकि यह न कहना पड़े कि हम है कौन
Sunday, July 25, 2010
Thursday, January 21, 2010
डायरी
मेरी उम्र, मेरे बरसों से नहीं
लगता है तेरे पृश्ठों से जुड़ी है
ओ डायरी
तेरे भरने तक मेरा जीना बहुत जरूरी है
ये कोरे कागज़ नहीं
मेरी वे सांसें हैं जिन्हें मैने अब तक जीया नहीं है
कहो इन्हें भरे बिना ही मर जाऊं ये बात सही है
ओ डायरी
तुम्हे यूं भरना है मुझे
जैसे वात्सल्य मां की छाती में दूध भरता है
सुहागन मांग में सिन्दूर भरती है
सिपाही बन्दूक में भरता है गोली वतन की हिफ़ाज़त के लिये
गुल्लक में भरता है पैसे कोई गरीब बुरे वक्त के लिये
सावन भरता है मस्ती रिम झिम बारिश के साथ
और कोई भरता है हिम्मत थाम के मुसीबत में हाथ
मेरी डायरी
तुम कोई पैसों का
जोड़- घटाव,गुना भाग नहीं हो
जिसे जैसे-तैसे भर दूं मैं
तुम शब्दों का वो सच हो
जिसका जनम आसान नहीं होता
अगर हो जाये तो कभी देहावसान नहीं होता
इसीलिये
जीने दो शब्दों के साथ मुझे अभी और
भरने दो ये कोरे कागज़ ताकि
जी सकूं मरने के बाद भी
शब्दों के साथ
ज़िन्दगी बन कर
लगता है तेरे पृश्ठों से जुड़ी है
ओ डायरी
तेरे भरने तक मेरा जीना बहुत जरूरी है
ये कोरे कागज़ नहीं
मेरी वे सांसें हैं जिन्हें मैने अब तक जीया नहीं है
कहो इन्हें भरे बिना ही मर जाऊं ये बात सही है
ओ डायरी
तुम्हे यूं भरना है मुझे
जैसे वात्सल्य मां की छाती में दूध भरता है
सुहागन मांग में सिन्दूर भरती है
सिपाही बन्दूक में भरता है गोली वतन की हिफ़ाज़त के लिये
गुल्लक में भरता है पैसे कोई गरीब बुरे वक्त के लिये
सावन भरता है मस्ती रिम झिम बारिश के साथ
और कोई भरता है हिम्मत थाम के मुसीबत में हाथ
मेरी डायरी
तुम कोई पैसों का
जोड़- घटाव,गुना भाग नहीं हो
जिसे जैसे-तैसे भर दूं मैं
तुम शब्दों का वो सच हो
जिसका जनम आसान नहीं होता
अगर हो जाये तो कभी देहावसान नहीं होता
इसीलिये
जीने दो शब्दों के साथ मुझे अभी और
भरने दो ये कोरे कागज़ ताकि
जी सकूं मरने के बाद भी
शब्दों के साथ
ज़िन्दगी बन कर
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Monday, January 4, 2010
मां
जिन दिनों अधिक व्यस्त होती थी मां
चढ़ जाता था मुझे बुखार
ताकि वह सारे काम छोड़ कर दौड़ी आये मेरे पास
सहलाती रहे मेरा सिर और करती रहे मुझे प्यार
मैं नित नये बहाने करती
और मेरी भोली मां नित नये नुसखे
अलग-अलग तरीकों से उतारती नज़र
कभी तेल व बाती लिये तो कभी नमक व राई लिये आती
किसी ओझा के भूत भागाओ मन्त्रों की तरह
न जाने क्या-क्या बुदबुदाती
मेरी एक छींक पर तैतीस करोड़ देवी-देवता याद आते थे उसे
और मुझे उसकी गोद में सारा ब्रह्मांड
प्रार्र्थनाओं का अर्थ नहीं समझती थी वह
पर अपनी निस्छ्ल भावनाओं से मेरी हर नादान ख्वाहिश
को पूरा करने का सामर्थ रखती थी ।
इस तरह मेरा झूठा बीमार होना तक
गौरवान्वित करता था मुझे
अब जबकिं मैं जानती हूं कि
मेरे बहानों को भी सच समझ कर
आसमां धरती पे उठा लेने वाली वह नहीं है
फिर भी उन आदतों की आदत से परेशान मैं
आज उन हाथों की छुअन को ढ़ूंढ़ती हूं
जो सारे कामों को छोड़ कर मेरा सिर सहलाती थी
और वो नज़र ,झाड़फूंक ,प्रार्थनाएं
जो केवल अपनी आस्था व प्यार के कारण असर दिखाती थी
बेशक वो सब आज नहीं हैं
पर उसकी दुआओं का असर
मेरी
सांसों में ज़िन्दग़ी बन कर धड़क रहा है
चढ़ जाता था मुझे बुखार
ताकि वह सारे काम छोड़ कर दौड़ी आये मेरे पास
सहलाती रहे मेरा सिर और करती रहे मुझे प्यार
मैं नित नये बहाने करती
और मेरी भोली मां नित नये नुसखे
अलग-अलग तरीकों से उतारती नज़र
कभी तेल व बाती लिये तो कभी नमक व राई लिये आती
किसी ओझा के भूत भागाओ मन्त्रों की तरह
न जाने क्या-क्या बुदबुदाती
मेरी एक छींक पर तैतीस करोड़ देवी-देवता याद आते थे उसे
और मुझे उसकी गोद में सारा ब्रह्मांड
प्रार्र्थनाओं का अर्थ नहीं समझती थी वह
पर अपनी निस्छ्ल भावनाओं से मेरी हर नादान ख्वाहिश
को पूरा करने का सामर्थ रखती थी ।
इस तरह मेरा झूठा बीमार होना तक
गौरवान्वित करता था मुझे
अब जबकिं मैं जानती हूं कि
मेरे बहानों को भी सच समझ कर
आसमां धरती पे उठा लेने वाली वह नहीं है
फिर भी उन आदतों की आदत से परेशान मैं
आज उन हाथों की छुअन को ढ़ूंढ़ती हूं
जो सारे कामों को छोड़ कर मेरा सिर सहलाती थी
और वो नज़र ,झाड़फूंक ,प्रार्थनाएं
जो केवल अपनी आस्था व प्यार के कारण असर दिखाती थी
बेशक वो सब आज नहीं हैं
पर उसकी दुआओं का असर
मेरी
सांसों में ज़िन्दग़ी बन कर धड़क रहा है
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Saturday, January 2, 2010
हाउस वाइफ़
गीले समेटे कपडों की तरह दोपहर गंधाई
कमरा किसी बंद डिब्बे की तरह दम घोंटू हो गया
दरवाज़ा खोला तो लगा
ये माचिस की डिब्बियों से बना लम्बा आयताकार मकान है
जहां तिल्लियों की तरह निस्तेज़ लोग हैं
खामोश ऊपर से नीचे तक चुप्पी साधे
अपने अपने डिब्बे में पड़े गंधा रहे हैं
मैंने झट दरवाज़ा बंद कर लिया
टेलिविज़न चलाया तो बिजली गुम हो गयी
टेलीफोन की ओर देखा शायद कोई रिसपांस मिले
कुछ पढ़ने को जी चाहा तो लगा मुश्किल है
शब्दों को समेटना वे भी किसी जीवनी हवा के स्पर्श को व्याकुल हैं
और मैं किसी बासी इतिहास की तरह उकता रही हूं
इस इंतजार में कि काश किसी शोध विद्याथी की नज़र यहां भी पड़े
अपनी तहों को खरोंच अपने अवशेष की तलाश खुद ही करने लगी
शायद कोई सजीवता,सक्रियता, सृजनता ढूंढने पर मिल जाये
समय सब के बावजूद सक्रिय था एकाएक शाम सिदूंरी नज़र आई
सुकून मिला कुछ सजीव रोमाटिंक अभी भी शेष है
पर धीरे-धीरे आसमान भूतहा नज़र आने लगा
फिर यह आवश्यक था कि आखें मूंदे बिस्तर पर पड़ी रहूं
सुबह तड़के बच्चों को स्कूल, पति को दफ्तर भेजना था
फिर दिन भर वहीं दोपहर,शाम,रात का सिलसिला
जहां माचिस की डिब्बीनुमा फ़्लैट में तिल्ली की तरह मैं
कांटती रहूं अपने दिन
और ऐसे एक -एक दिन से बनी मेरी ज़िन्दगी
जहां मैं,मैं नहीं
और सब कुछ हूं
कमरा किसी बंद डिब्बे की तरह दम घोंटू हो गया
दरवाज़ा खोला तो लगा
ये माचिस की डिब्बियों से बना लम्बा आयताकार मकान है
जहां तिल्लियों की तरह निस्तेज़ लोग हैं
खामोश ऊपर से नीचे तक चुप्पी साधे
अपने अपने डिब्बे में पड़े गंधा रहे हैं
मैंने झट दरवाज़ा बंद कर लिया
टेलिविज़न चलाया तो बिजली गुम हो गयी
टेलीफोन की ओर देखा शायद कोई रिसपांस मिले
कुछ पढ़ने को जी चाहा तो लगा मुश्किल है
शब्दों को समेटना वे भी किसी जीवनी हवा के स्पर्श को व्याकुल हैं
और मैं किसी बासी इतिहास की तरह उकता रही हूं
इस इंतजार में कि काश किसी शोध विद्याथी की नज़र यहां भी पड़े
अपनी तहों को खरोंच अपने अवशेष की तलाश खुद ही करने लगी
शायद कोई सजीवता,सक्रियता, सृजनता ढूंढने पर मिल जाये
समय सब के बावजूद सक्रिय था एकाएक शाम सिदूंरी नज़र आई
सुकून मिला कुछ सजीव रोमाटिंक अभी भी शेष है
पर धीरे-धीरे आसमान भूतहा नज़र आने लगा
फिर यह आवश्यक था कि आखें मूंदे बिस्तर पर पड़ी रहूं
सुबह तड़के बच्चों को स्कूल, पति को दफ्तर भेजना था
फिर दिन भर वहीं दोपहर,शाम,रात का सिलसिला
जहां माचिस की डिब्बीनुमा फ़्लैट में तिल्ली की तरह मैं
कांटती रहूं अपने दिन
और ऐसे एक -एक दिन से बनी मेरी ज़िन्दगी
जहां मैं,मैं नहीं
और सब कुछ हूं
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Thursday, September 17, 2009
१४ सितम्बर हिन्दी दिवस
्कल कल बह कर भाषाओं की सारी नदियां
मिल कर एक विशाल समन्दर बन जाती है
यहीं समन्दर बादल बन जब छा जाता है
मिट्टी से सौंधी सौंधी खुश्बू आती है
इस खुश्बू से सब का मन हो जाता चंदन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वन्दन
जिस भाषा में मां चूल्हे को लेपा करती
जिस भाषा में घूरड़ घूरड़ कर चक्की चलती
बूढ़ा बरगद जिस भाषा में पास बुलाता
एक घर का आंगन दूजे आंगन से बतियाता
एक मन का दुख जब जन जन का हो जाता क्रंदन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वन्दन
जिसमें चूड़ी कन्गना आपस में बतियायें
कुमकुम बिंदिया जिसमें माथे को चमकायें
हल्दी माहवर महेंदी जिसमें रंग लाती हो
दुल्हन सिमट सिमट कर जिसमें शरमाती हो
स्वयं सुहागन करती हो रण का अभिनन्दन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वन्दन
मिल कर एक विशाल समन्दर बन जाती है
यहीं समन्दर बादल बन जब छा जाता है
मिट्टी से सौंधी सौंधी खुश्बू आती है
इस खुश्बू से सब का मन हो जाता चंदन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वन्दन
जिस भाषा में मां चूल्हे को लेपा करती
जिस भाषा में घूरड़ घूरड़ कर चक्की चलती
बूढ़ा बरगद जिस भाषा में पास बुलाता
एक घर का आंगन दूजे आंगन से बतियाता
एक मन का दुख जब जन जन का हो जाता क्रंदन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वन्दन
जिसमें चूड़ी कन्गना आपस में बतियायें
कुमकुम बिंदिया जिसमें माथे को चमकायें
हल्दी माहवर महेंदी जिसमें रंग लाती हो
दुल्हन सिमट सिमट कर जिसमें शरमाती हो
स्वयं सुहागन करती हो रण का अभिनन्दन
ऐसे मन की भाषा हिन्दी का हो वन्दन
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५ सितम्बर
अ से अनार
आ से आम
वर्णमाला के एक एक अक्षर
उसी तरह हमारी टीचर ने हमारे मुंह में डाले
जिस तरह मां ने रोटी के निवाले
मां आंचल में छिपाये रखना चाहती थी
टीचर दुनिया से मुकाबला करवाती थी
मां कभी परीक्षा नहीं लेती
ताकि हम हार न जाऐं
टीचर बार बार परीक्षाऐं लेती ताकि
हम जीत के काबिल बन पाऐं
मां कहती उधर न चढ़ना गिर जाओगे
टीचर कहती बेशक गिरो पर बार बार चढ़ना
एक दिन सम्भल जाओगे
इस तरह जीवन की हर राह में
हम जीत हासिल कर सकें
मुश्किलों से लड़ सकें
यह सिखाने वाले होते हैं हमारे टीचर
जो कभी भुलाये नहीं जाते हैं
और सिखने सिखाने की बात हो
तो उम्र भर याद आते हैं
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Thursday, September 10, 2009
मुक्तक
अपनी पलकों पे आब रखती हूं
मैं भी आंखों में ख्वाब रखती हूं
बिन तेरे कैसे कटा है ये सफ़र
हमसफ़र ये हिसाब रखती हूं
सबकी आंखों में एक समन्दर हैं
कितना धुंधला हर एक मंज़र है
हंस रहा आदमी बस बाहर से
सच तो कुछ और है जो अंदर है
गर बदी है तो संग शराफ़त है
प्यार है तो ही तो शिकायत है
है मुनासीब हंसी वहीं केवल
आंसूंओं की जहां हिफ़ाज़त है
लोग ऐसे भी मिलते जाते है
खास दिल में जगह बनाते हैं
नाम होता नहीं इन रिश्तों का
उम्र भर साथ पर निभाते हैं
मैं भी आंखों में ख्वाब रखती हूं
बिन तेरे कैसे कटा है ये सफ़र
हमसफ़र ये हिसाब रखती हूं
सबकी आंखों में एक समन्दर हैं
कितना धुंधला हर एक मंज़र है
हंस रहा आदमी बस बाहर से
सच तो कुछ और है जो अंदर है
गर बदी है तो संग शराफ़त है
प्यार है तो ही तो शिकायत है
है मुनासीब हंसी वहीं केवल
आंसूंओं की जहां हिफ़ाज़त है
लोग ऐसे भी मिलते जाते है
खास दिल में जगह बनाते हैं
नाम होता नहीं इन रिश्तों का
उम्र भर साथ पर निभाते हैं
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