और
मैं तुम्हें अपनी अंतिम साँस तक
यूं याद करूं बेइंतहा
ये कितना लाज़मी है
मुझे नहीं मालूम
तुम्हारे जीते जी तुमसे बिछोह
कभी सोचा न था।
अब तुम्हारे जाने के बाद
इतना तुम्हारा याद आना
बहुत कष्टकर है।
बस ये जानती हूँ।
वश चले तो
सारे रिश्ते,यादें,बातें
मिटा दूं अपने स्मृति पटल से
जैसे कभी हुए ही नहीं थे।
तुम विदा हो ही गये हों तो
विदा हो ही जाओ ना।
क्यों मेरे विदा होने का
कर रहे हो इंतजार।
मुझे नहीं देखना
कोई कारवां दिवंगत रिश्तों का।
जो छोड़ तो जाते हैं रोते हुए।
फिर जब-तब याद आते हैं
रुलाने के लिए।
आखिर क्यूँ
होता है ये सब
क्यूं भूला देने को मनचाहा
कोई डिलीट का बटन
नहीं बना अब तक?
ऋतु गोयल
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