सारे जग में दिख रहें,तेरे पावन काज।
इक रुपया इक ईट से,ऐसा बना समाज।
आपस के सहयोग से,पूर्ण हुए सब काज।
अग्रोहा एक वृक्ष है,सबको देता छाँव
भले कहीं कोई रहे,वहीं सभी का गांव
अग्रोहा एक तीर्थ है, क्यूं सब जाते भूल।
कर्म स्थल महाराज का,शीश लगाओ धूल।
लक्ष्मी पूजन सब करें,त्याग भाव है पाठ।
दान,धान्य,व्यापार से,घर-घर में हैं ठाठ।
तुझसे ही पहचान है,हम तेरी संतान।
साढ़े सत्रह गौत्र की,है तुझसे ही शान।
एक पिटारा दान का,ऐसा बाँधा साथ।
खाली ये होगा नहीं,बांटो दोनों हाथ।
अपने-अपने हित करें,परहित कैसे होय।
वो हो परहित कर सकें,जो निजहित न रोय।
ऋतु गोयल
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