Thursday, September 10, 2009

मुक्तक

अपनी पलकों पे आब रखती हूं
मैं भी आंखों में ख्वाब रखती हूं
बिन तेरे कैसा  कट रहा है सफ़र
हमसफ़र ये हिसाब रखती हूं

सबकी आंखों में एक समन्दर है
कितना धुंधला हर एक मंज़र है
आदमी हंस रहा ऊपर-ऊपर
सच तो कुछ और है जो अंदर है

गर बदी है तो संग शराफ़त है
प्यार है इसलिए  शिकायत है
है मुनासिब  हंसी वहीं केवल
आंसुओं की जहां हिफ़ाज़त है

लोग ऐसे भी मिलते जाते हैं
खास दिल में जगह बनाते हैं
नाम होता नहीं है  रिश्तों का
उम्र भर साथ जो  निभाते हैं

6 comments:

  1. आपकी रचना की जितनी तारीफ करूँ कम है... मन के अंतर्द्वंद को शब्द दिए हैं आपने

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  2. बहुत खूब वाह

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  3. अपनी पलकों पे आब रखती हूं
    मैं भी आंखों में ख्वाब रखती हूं ...........

    क्या बात है. बेहतरीन है ये ...

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  4. बेहतरीन मुक्तक..आनन्द आया.

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