Wednesday, July 8, 2009

सावन उनसे जाके कहना रे



 
     सावन कहना रे 

सावन उनसे जाके कहना रे
इस मौसम में भी
उनके बिन
कैसा रहना रे

मन तो मन है
देख के बादल
चहक उठा
मचल गया
पर बादल यूं बरसा
मुझको छोड के प्यासी
निकल गया
कितनी बारिश लौट गयी यूं
अब ना दहना रे

बाहों के झूलों में झूलूं,
 झोंटें दें उनकी बतियां
गुलमोहर सी खिली शाम हो
रजनीगन्धा सी रतियां
साथ के चन्दन की खूशबू में
 संग -संग बहना रे

दोनों हाथों में हैं कंगन
लेकिन उनमें खनक नहीं
बिंदिंया हैं पर चमक नहीं है
पायल हैं पर छमक नहीं
हर गहना,
 गहना हो जाये
 खुद ही पहना रे 

3 comments:

  1. bahut pyara
    bahut sundar
    bahut saumya geet................

    badhaai !

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  2. nice poem

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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