Saturday, December 13, 2014

कविता



         कविता 

कविता तू तड़प रही है
अपने जनम के लिए
किन्तु बहुत सी तैयारियाँ शेष हैं
प्रसव के पहले
तू इंतज़ार कर कुछ और
मेरे भावों को धमनियों में
उमड़ने-घुमड़ने दे
मेरे रक्त मज्जा से खुद को
और सनने दे
जनम देना इतना सहज नहीं
और शब्दों का जनम नौ महीने क्या
नौ वर्ष भी लेंगे
जितना तड़पेगी भीतर तू
उतने युगों तक जियेगी
कविता
मुझे भावों का दर्द अभी
और सहने दे
इस प्रसव पीड़ा को
और रहने दे 

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